Posts

Showing posts with the label Inspiration Poems

होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो by कुमार विश्वास

Image
Photo Credit : Social Media दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इसका मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इसकी सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूं चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो

Hindi Poem | गरीब माँ बाप की बेटी

Image

कभी न रोने वाला बापू,फूट फूट कर रोया है | दिल को झकझोरनेेंं वाली विटिया की विदाई कविता ǃ

Image
कन्यादान हुआ जब पूरा,आया समय विदाई का ।। हँसी ख़ुशी सब काम हुआ था,सारी रस्म अदाई का ।  बेटी के उस कातर स्वर ने,बाबुल को झकझोर दिया ।। पूछ रही थी पापा तुमने,क्य ा सचमुच में छोड़ दिया ।। अपने आँगन की फुलवारी,मुझको सदा कहा तुमने ।। मेरे रोने को पल भर भी ,बिल्कुल नहीं सहा तुमने ।।  क्या इस आँगन के कोने में, मेरा कुछ स्थान नहीं ।। अब मेरे रोने का पापा,तुमको बिल्कुल ध्यान नहीं ।। देखो अन्तिम बार देहरी,लोग मुझे पुजवाते हैं ।। आकर के पापा क्यों इनको,आप नहीं धमकाते हैं।।  नहीं रोकते चाचा ताऊ,भैया से भी आस नहीं।। ऐसी भी क्या निष्ठुरता है,कोई आता पास नहीं।। बेटी की बातों को सुन के ,पिता नहीं रह सका खड़ा।। उमड़ पड़े आँखों से आँसू,बदहवास सा दौड़ पड़ा ।।  कातर बछिया सी वह बेटी,लिपट पिता से रोती थी ।। जैसे यादों के अक्षर वह,अश्रु बिंदु से धोती थी ।। माँ को लगा गोद से कोई,मानो सब कुछ छीन चला।। फूल सभी घर की फुलवारी से कोई ज्यों बीन चला।।  छोटा भाई भी कोने में,बैठा बैठा सुबक रहा ।। उसको कौन करेगा चुप अब,वह कोने में दुबक रहा।। बेटी के जाने पर घर ने,जाने क्या क्या खोय...

नर भेेडिया | सोलंंकी जी की नवीन रचना

Image
uj & HksfM+;k bd vcks/k fucZy ckyk ij dky cuk eWMjk;sajs ekuo D;ksa cu x;k HksfM+;k ] uksp & 2 ru [kk;sjs AA ukps nq’V nfjank “ko ij ] [kwu fi;s vaxMk;sjs AA pgd jgh Fkh dksbZ dfydk tks viusa eu dh Fkh efydk A cquh v/kwjh pknj lh Fkh ] fueZy xaxk lkxj lh Fkh AA ftlds ikou thou ij D;ksa dkys ckny Nk;sjs A    1 ekuo D;ksa cu x;k HksfM+;k ] uksp & 2 ru [kk;sjs AA lquksa lquksa ,s bTtr okyks ] cgu csfV;ksa ds j[kokyks A mBks tokuksa fgEerokyksa ] vcykvksa dh ykt cpkyks AA Nw uk ik;s dksb nfjank ] uk “kSrku lrk;s js A        2 ekuo D;ksa cu x;k HksfM+;k ] uksp & 2 ru [kk;sjs AA viusa gh bl ns”k ds HkkbZ ] cusa vkt tYykn dlkbZ A iwoZtksa dh lk[k ulkbZ ] ykt ywVrs g;k u vkbZ A Loa; tw>rh jgh vdsyh gk vc dkSu cpk;s js A       3 ekuo D;ksa cu x;k HksfM+;k ] uksp & 2 ru [kk;sjs AA lksrh gqbZ fdlh ckyk dks ] mBk ys x;k ih gkyk dks A paaxqy esa Ql x;h vdsyh ] NViVk;s cu xbZ igsyh A tdM+ xbZ iatksa esa ,slh ] N...

नर हो, न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त (Famous Inspiration Poems in Hindi)

नर हो, न निराश करो मन को / मैथिलीशरण गुप्त ! कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को। संभलो कि सुयोग न जाय चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलंबन को नर हो, न निराश करो मन को। जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को। निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे सब जाय अभी पर मान रहे कुछ हो न तज़ो निज साधन को नर हो, न निराश करो मन को। प्रभु ने तुमको कर दान किए सब वांछित वस्तु विधान किए तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो फिर है यह किसका दोष कहो समझो न अलभ्य किसी धन को नर हो, न निराश करो मन को। किस गौरव के तुम योग्य नहीं कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं जान हो तुम भी जगदीश्वर के सब है जिसके अपने घर के फिर दुर्लभ क्या उसके जन को नर हो, न निराश करो मन को। करके विधि वाद न खेद करो निज लक्ष्...

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? - हरिवंशराय बच्चन

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?  - हरिवंशराय बच्चन  कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था। स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों को एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है। बादलों के अश्रु से धोया गया नभ-नील नीलम का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम प्रथम ऊषा की किरण की लालिमा-सी लाल मदिरा थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनों हथेली एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है। क्या घड़ी थी, एक भी चिंता नहीं थी पास आई कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी न छाई आँख से मस्ती झपकती, बात से मस्ती टपकती थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई वह गई तो ले गई उल्लास के आधार, माना पर अथिरता पर समय की मुसकराना कब मना है है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है। हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिनमें राग जागा वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँग...