मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है | वसीम बरेलवी
Photo : Google तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता यह और बात कि बचने के घर नहीं आते 'वसीम' जहन बनाते हैं तो वही अख़बार जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते